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कुण्डलपुर का इतिहास

कुण्डलपुर, मध्य प्रदेश के दमोह जिले में स्थित एक ऐतिहासिक तीर्थ है। प्राचीन समय में इसे कुंडलगिरी नाम से जाना जाता था। यह नाम हिंदी शब्द "कुंडल" पर रखा गया है, जिसका अर्थ होता है- झुमके। कुण्डलपुर के पर्वत का आकार कुण्डल के समान प्रतीत होता है अतः इसको यह नाम दिया गया। इस क्षेत्र का इतिहास लगभग २४०० साल अर्थात ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी का माना जाता है, जो यह है कि जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की श्रमण परंपरा में अंतिम केवली श्रीधर स्वामी ने इसी कुण्डलपुर से निर्वाण प्राप्त किया है। इसका उल्लेख पहली शताब्दी ईस्वी में महान जैन आचार्य श्री यतिवृषभ महाराज ने अपने ग्रंथ तिलोयपण्णत्ती में किया है, जो प्राकृत भाषा में लिखा गया है।

 

कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र पर्वत पर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव, जिन्हें बड़े बाबा के नाम से भी जाना जाता है, की एक प्राचीन भव्य प्रतिमा विराजमान है। शिलालेखों के अनुसार, बड़े बाबा की यह १५ फीट ऊँची पद्मासन प्रतिमा ६वीं शताब्दी में बनाई गई थी। बड़े बाबा की वेदी के नीचे, यक्ष गोमुख देव और यक्षिणी चक्रेश्वरी देवी की मूर्तियाँ भी निर्मित हैं, जिनका निर्माण भी ६वीं शताब्दी में हुआ था। पश्चात विक्रम संवत १७५७ (१७०० ईस्वी) में बुंदेलखंड केसरी महाराज छत्रसाल द्वारा बड़े बाबा के मूल प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया, जिसका प्राचीन शिलालेख गर्भगृह की बाहरी दीवार पर अंकित है।

 

कुण्डलपुर केंद्र

एक महान राष्ट्रहित चिंतक संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की पावन प्रेरणा और आशीर्वाद से, हथकरघा प्रशिक्षण पर केंद्रित एक धर्मार्थ ट्रस्ट "महाकवि पंडित भूरामल सामाजिक सहकार न्यास" की स्थापना वर्ष २०१६ में कुण्डलपुर में की गई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार उपलब्ध कराना था। इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को पलायन से रोकना और बेरोजगार युवाओं को स्वावलम्बी बनाना है। ग्रामीण क्षेत्रों के कृषकों, श्रमिकों एवं आदिवासी समुदाय के युवाओं को विभिन्न प्रकार के हथकरघा कला-कौशल में प्रशिक्षित कर उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का उत्थान यहाँ किया जा रहा है। वर्तमान में इस केन्द्र के माध्यम से लगभग १५० से अधिक युवाओं को नियमित रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है।

प्राचीन वास्तुकला के आधार पर कुण्डलपुर में विभिन्न ऐतिहासिक तत्वों और रूपांकनों की एक श्रृंखला विकसित की गई थी। ये रूपांकन वर्तमान में साड़ियों के बॉर्डर एवं मध्य भाग में बूटी आदि के रूप में उपयोग किए जा रहे हैं। साड़ियों को केवल सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले चमकदार सूती धागे और धातु-जरी से बनाया जाता है।

कुण्डलपुर पर्वत की सुरम्य वलयाकार श्रेणियाँ, पर्वतों पर प्रचुर मात्रा में पाये जाने वाले सेज के फूल तथा सागौन के वृक्षों के फलों के मनमोहक चित्र इन साड़ियों में तदनुरूप डिजाईन के माध्यम से उभारे गये हैं।

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